सामाजिक संवेदनशीलता और कर्तव्यपरायणता का अद्भुत उदाहरण पेश करते हुए फॉरबिशगंज के आरपीएफ (रेलवे सुरक्षा बल) की तत्परता ने एक मासूम बच्चे को अनहोनी से बचा लिया। यह घटना बिहार के फारबिसगंज रेलवे स्टेशन की है, जहां एक मात्र 7 वर्षीय बच्चा मोहम्मद रियाज बिना किसी अभिभावक के एक ट्रेन में पाया गया। बच्चा डरा-सहमा हुआ था, लेकिन आरपीएफ की त्वरित कार्रवाई ने न केवल उसे सुरक्षित बचाया बल्कि उसका भविष्य भी सुरक्षित करने की दिशा में अहम कदम उठाया।
मोहम्मद रियाज, जो सुपौल जिले के प्रतापगढ़ इलाके के लक्ष्मीपुर वार्ड संख्या 15 का निवासी है, अपने घर से भागकर ट्रेन में सवार हो गया था। वह स्वर्गीय मुख्तार का पुत्र है। पूछताछ के दौरान उसने जो कहानी बताई, वह दिल को झकझोर देने वाली थी। उसकी मां घर पर नहीं रहती, और वह भिक्षा मांगकर किसी तरह अपना जीवन यापन करती है। घर में उसकी देखभाल की जिम्मेदारी भाभी सकीना और फिरोज नामक एक पुरुष के पास थी, जो नियमित रूप से उसे शारीरिक प्रताड़ना देते थे। इस उत्पीड़न से तंग आकर मासूम रियाज ने घर छोड़ने का फैसला लिया और ललित ग्राम स्टेशन से एक अनजान ट्रेन में सवार हो गया।
रियाज का जीवन उस समय खतरे में पड़ गया जब कुछ संदिग्ध यात्री ट्रेन में उसे बहलाने-फुसलाने की कोशिश करने लगे। यदि समय पर हस्तक्षेप नहीं होता, तो यह बच्चा किसी तस्करी या शोषण का शिकार हो सकता था। सौभाग्य से, ट्रेन में मौजूद किशनपुर सुपौल निवासी आईएमसी (इंटरनेशनल मार्केटिंग कॉर्पोरेशन) की सदस्य संजना कुमारी ने इस स्थिति को समझा और तुरंत फारबिसगंज स्थित आरपीएफ कार्यालय को सूचना दी।
सूचना मिलते ही आरपीएफ प्रभारी उमेश प्रसाद सिंह अपनी टीम के साथ सक्रिय हो गए और बच्चे को ट्रेन से सुरक्षित बाहर निकालकर आरपीएफ कार्यालय लाया गया। वहां उसे पहले नाश्ता कराया गया, फिर स्नेहपूर्वक उसकी काउंसलिंग की गई। बातचीत में उसने अपनी आपबीती साझा की, जिसे सुन हर कोई भावुक हो गया। यह स्पष्ट था कि बच्चा न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी प्रताड़ित था।
आरपीएफ ने इस मामले की जानकारी जागरण कल्याण भारती संस्था के अध्यक्ष संजय कुमार शर्मा को दी। इस एनजीओ की सहायता से बच्चे को सुपौल जिला मुख्यालय स्थित चाइल्ड हेल्पलाइन को सौंप दिया गया, जहां उसकी समुचित देखरेख सुनिश्चित की जा रही है। संजय कुमार शर्मा ने स्पष्ट कर दिया कि बच्चे को किसी भी संदिग्ध या झूठे रिश्तेदार को नहीं सौंपा जाएगा। जब तक उसके परिवार की वास्तविकता की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक उसे सरकारी संरक्षण में ही रखा जाएगा।
आरपीएफ प्रभारी उमेश प्रसाद सिंह ने इस घटनाक्रम को अत्यंत संवेदनशील मानते हुए कहा कि बच्चा एक गंभीर संकट में था और समय रहते हस्तक्षेप करने से उसकी जान और भविष्य दोनों को सुरक्षित रखा जा सका। उन्होंने यह भी जोड़ा कि आरपीएफ केवल रेलवे सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग – बच्चों – की सुरक्षा के लिए भी पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि यदि समाज में कुछ लोग सजग और संवेदनशील बने रहें, तो न जाने कितने मासूमों की जिंदगी उजड़ने से बचाई जा सकती है। आरपीएफ, संजना कुमारी और जागरण कल्याण भारती जैसी संस्थाओं की संयुक्त पहल ने एक छोटे से बच्चे को नया जीवन दिया – यह केवल एक रेस्क्यू नहीं, बल्कि इंसानियत की जीत है।

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